मेरी कीमत अगर पूछो ज़माने के बाज़ारों में ,
तेरी क़दमों की खाक भी बिकेगी मुझसे बेहतर ही .
भलाई, सच्चाई ,प्यार का कोई मोल क्या होगा ,
यह वोह दौलत है जो रख्खें हैं चंद हमसे ही .हमें रुस्वाइयाँ प्यारी ,हमें धिक्कार का क्या ग़म
हर दौर में हासिल हुई हमें तन्हाई  ही .

अश्क छलका  कर आखिर क्या करें हासिल ,
न ग़म आये नज़र तो बस रोलेतें हैं दिल में ही .

इबादत उस खुदा की अब मुझसे नहीं होती ,
जो बस देखा किये है सब मुझसे छिनते ही .

मेरा गर मोल करना हो तो कुछ ऐसी नज़र लाओ ,
देख सकती हो जो दुनिया में शराफत भी।

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