सुबह  हो जाए 

तू जिधर चाहे निकल जाए सुबह हो जाए ,
 ग़म जितने भी हैं सारे हवा हो जाएँ।
तेरे क़दमों की चाहत में ज़मीं बिछती है ,
तेरे दीदार को ही सूरज सर पर आये ,
तू जिधर चाहे निकल जाए सुबह हो जाए।
मुस्कुरा मत के पतझड़ का मौसम है अभी ,
कहीं फूल खिलने को न मचल जाएँ ,
तू जिधर चाहे निकल जाए सुबह हो जाए।
बारिशों में यूँ जुल्फें बनाया न करो,
घटाएँ न कहीं इस कदर बरसती जाएँ,
तू जिधर चाहे निकल जाए सुबह हो जाए।
घर चले जाओ की रात होने को है,
आप के सामने कहीं चाँद नज़र न आये,
तू जिधर चाहे निकल जाए सुबह हो जाए।
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