ऐसा नहीं होता।

मुझे अपना बना लेते तो फिर ऐसा नहीं होता,
के घबराके जब उठते तो दिल तन्हा नहीं होता।

जो कभी ख्वाहिश मचल जाती इन तारों को पाने की,
तो फिर उस दिन कोई तारा भी गर्दिश में नहीं होता।

फूलों से सजाओगे कभी जो अपने शाने को,
मेरा दावा है फूल उस दिन कोई फिर कली नहीं होता।

तपिश तुमको सताती जो कभी बाहर निकलने पर,
तुम रुख़ अपना दिखादेते तो ये सूरज नहीं होता।

सुर्ख जोड़े में सजने की जो तुम चाहत जगा लेते,
‘सिफर’,जिस्म में एक कतरा भी फिर लहू नहीं होता।
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8 thoughts on “Aisa Nahin Hota

  1. तपिश तुमको सताती जो कभी बाहर निकलने पर,
    तुम रुख़ अपना दिखादेते तो ये सूरज नहीं होता।
    …………………..सुन्दर रचना ……

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